Ashwini Dev Pandey

Ashwini Dev Pandey

Wednesday, September 8, 2010

चीखता चिल्लाता सोनभद्र - क्या मेरा यही हक़ था ?

चीखता चिल्लाता सोनभद्र - क्या मेरा यही हक़ था ?
भय भूख भ्रस्टाचार के गठजोड़ में फंशा सोनभद्र

मै सोनभद्र हूँ , मेरे जन्म को लगभग २२ वर्ष पूरे हो गए अर्थात मै जवान हो गया हूँ जब भी मै अपनी पिछली जिन्दगी की तरफ देखता हूँ तो बड़ा आस्चर्य होता है जब इस दीन हीन अवस्था में मुझे रखना था तो आखिर मुझे जन्म ही क्यूँ दिया गया इससे तो अच्छा होता की प्रसव काल में ही मुझे मार दिया जाता परन्तु अब तो मै इन सारी बाधाओ को पार कर अपनी युवावस्था में प्रवेश कर गया हूँ, अब मै अपने अत्याचारियो से लड़ सकता हूँ , अब उन लोगो से सवाल पूछ सकता हूँ जिन्होंने शैशवावस्था में जम कर मुझे लूटा और उस लूट के बदले मुझे क्या दिया ? बस रोते शिशकते सोनभद्र की यही कहानी नहीं है यह तो बानगी मात्र है अब सोनभद्र भी यही पूछ रहा है अपने हाकिमो से कि क्या यही मेरा हक़ है ? आप सब को पाता है कि १९८९ में मिर्जापुर जनपद को तोडकर उसके दछिनी हिस्से में जो प्राकृतिक संसाधनों जंगल व पहाड़ो से परिपूर्ण हिस्सा था उसमे सोनभद्र का गठन किया गया जिले के निर्माण के समय तत्कालीन कांग्रेस सरकार के मुख्यमंत्री नारायण दत्त त्रिपाठी ने कहा था कि यह जनपद प्रदेश व देश के लीए रोल माडल बनेगा क्यूँ कि यहाँ मौजूद संसाधनों का प्रबंध कर सरकार यहाँ के गरीब व आदिवाशियो के जीवन सुधार हेतु महत्त्वपूर्ण कदम उठाएगी जिससे यहाँ की भूख व गरीबी, अशिछा अराजकता , भ्रष्टाचार शोषण इतिहास में लिखी बाते ही साबित होंगी .
परन्तु आज लगभग २२ वर्ष जवान होते सोनभद्र पर विचार करने पर ऐसा प्रतीत होता है कि तत्कालीन मुख्यामंत्री द्वारा अतीत में देखा गया एक सपना था जो स्वएम एक इतिहास बन चूका है तथा सोनभद्र गहन अन्धकार में डूबा भ्रस्टाचार कि उच्चतम पायदान पर बैठा एक ऐसे भयावह सच से हम सब को रूबरू करा रहा है जिसकी तरफ देखने का साहस शायद ही कोई संवेदनशील ब्यक्ति कर पाए परन्तु इस सच को देखने के लीए हम सब मजबूर हैं और आज आप को भी अपने नजरिये से देखने का आग्रह भी कर रहे हैं . क्या आप सोच सकते हैं जो जनपद पूरे प्रदेश को अधिकतम राजस्व प्रदान करता है वहा कि ७५% जनता को पीने के लीए पानी तक नहीं मिल पा रहा , आप ऐसा मत सोचिये कि सरकार इसे दूर करने के लीए प्रयास नहीं करती वह तो इतने बड़े- बड़े पैकेज इस जनपद के विकास योजनाओ के लीए भेजती है कि यदि उस पैसे का पच्चास प्रतिसत भी यहाँ के जमीन पर खर्च कर दिया जाये तो यह जनपद स्वर्ग बन गया होता परन्तु ऐसा नहीं हुआ शायद यहाँ के अधिकारियो और नेताओ के गठजोड़ ने भ्रस्टाचार कि ऐसी मजबूत कड़ी बना ली है कि इनकी पूरी कोशिश रहती है कि विकाश योजनाओ का पूरा पैसा ही इन्ही लोगो कि जेब में चला जाये , यदि ऐसा नहीं होता तो पिछले दो वर्षो में राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के अंतर्गत इस जनपद में जितने भी चेकडेम बने हैं यदि आप खुली आंख से देख लेंगे तो कहेंगे यह क्या है ? एकाध बानगी आप के सामने रखते हैं कुछ चेकडेम जिनकी लम्बाई ५ या ६ मीटर ही होगी उसे बनाने के लीए यहाँ के अधिकारिओ ने यहाँ ९८ लाख रुपये तक खर्च कर दिए हैं यहाँ आप सोच सकते हैं कि इतने रुपये में इतना सीमेंट मिलेगा कि केवल सीमेंट से ही इससे बड़ा चेकडेम बनवाया जा सकता है , यहाँ ऐसा मस्टरोल बनता है जो आम आदमी जिस तारीख को ग्राम सभा में कार्य करता है वही आदमी उसी दिन छेत्र पंचायत में कार्य करता है तथा वहि आदमी उसी दिन यदि गहनता से जाँच कि जाये तो जिला पंचायत में काम करता मिल जायेगा . यह हम नहीं सोनभद्र के आफिसो में रखी मस्टरोल की कापिया कह रही हैं , पिछले महीने जनपद दौरे पर आये राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना के केंद्रीय सदस्य संजय दीछित ने जनपद में हुवे कार्यो के भौतिक सत्यापन के बाद जो रिपोर्ट केंद्रीय ग्रामीण मंत्रालय को सौपी है उसमे उन्होंने उल्लेख किया है लगभग ५०० चेकडेम सोनभद्र में कागजो पर ही बना दिए गए और उसके बनाने में आये खर्च जो २ से ५ अरब रुपये के बीच है सोनभद्र के अफसर व राजनितिक लोग व अन्य कुछ दबाव समूहों कि जेबों में चले गए हैं , संजय दीछित ने सोनभद्र में गबन किये गए इस विकास के धन के रिकवरी करने के लीए भी केन्द्रीय ग्रामीण मंत्रालय से संस्तुति कि है . ऐसे अब आप खुद ही सोच सकते हैं भ्रष्टाचार अपने किस रूप में हमारे सामने है - यह बात रही विकाश कि .
अब हम आपको उस छेत्र से रूबरू करवाते हैं जो सोनभद्र का दिल कहा जाता है, यह है खनन छेत्र जो बालू व क्रशर रूप में यहाँ देखने को मिलता है, पर इस छेत्र में भ्रष्टाचार कि अपनी ही कहानी है - वैध अवैध खनन, आराछित वन छेत्रो तक में खनन पर्यावरण सुरक्छा के मनको के अनदेखी की वो कहानी है जिसे देख कर दिल दहल जाये और ये सोनभद्र का कलेजा ही है जो इसे बर्दास्त कर रहा है , इस पुरे छेत्र को पर्यावरण प्रदुषण का साम्राज्य तक कहा जाता है , इसे कौन रोकेगा ? रुकेगा भी या नहीं कहा तक चलेगा यह अंतहीन सिलसिला . ऐसे तमाम सवाल हैं जो दिल में कैद हैं .
सोनभद्र को उर्जांचल की राजधानी भी कहा जाता है यहाँ लगभग ११ हजार मेगावाट बिजली का उत्पादन भी किया जाता है पर सोनभद्र की राते अँधेरे में ही कटती हैं किसी ने सच ही कहा है चिराग तले अँधेरा , प्रदेश समेत अन्य राज्यों को रौशनी देने वाले जनपद सोनभद्र के लोगो के लीए बिजली ही नहीं है .
भूख, गरीबी, अशिछा, अराजकता, भ्रष्टाचार, नक्सलवाद के साथ अनगिनत समस्याओ के आगोश में चीखता चिल्लाता बेबस लाचार सोनभद्र अपनी किस्मत पर आंसू बहाते हुवे हर उस आदमी से एक ही सवाल कर रहा है क्या मेरा यही हक़ था ? क्यूँ मेरे साथ ये हो रहा है .



ब्रजेश पाठक / अश्विनी देव पाण्डेय

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2 comments:

  1. bahot badhiya bhai , kash hamare janpad ke bare me yaha ke aaladhikari bhi sochte aap ki soch bahot hi achhi hai dhanyvad ye bate ham tak pahochane ke liye aise hi likhte rahiye

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